गुलशेर खान शानी की पुण्यतिथि पर कहानी- एक नाव के यात्री

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भीड़ रोज जैसी थी, गए साल जैसी या शायद गुजरे हुए उन सातों बरस जैसी. कोई भी मौसम हो, चाहे जैसा दिन या घड़ी, यात्राओं का क्रम कभी नहीं टूटता. जब भी स्टेशन आओ, भीड़ का एक ही रूप दिखाई देती है

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